#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

एक बस तुम ही

 

मेरी बैशाखियां बन कर

मुझे सहारा देने वाली

मेरे पथ के कांटो को

पलकों से चुनने वाली

एक बस तुम ही तो थी।

 

बनकर रक्षक मुसीबतों में

रक्षा मेरी करने वाली

हर किसी दुष्ट नजर से

मुझको तुम बचाने वाली

एक बस तुम ही तो थी।

 

आग के अंगारों पर

आेेंस की बूंदे बिछाने वाली

गरमी की उमस में

दृगों से प्यास बुझाने वाली

एक बस तुम ही तो थी।

-ः0ः-

नवलपाल प्रभाकर दिनकर

 

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