#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

धरती वंदना

 

हे मां, तेरी है शान निराली

आभा अद्भूत चमकत न्यारी ।

 

तेरे सारे पेड़ ये झूमें

हवा के शीतल झोंकों से

मन भी कंपित सा होकर

भरता पंछी बन उडारी ।

 

हे मां, तेरी है शान निराली

आभा अद्भूत चमकत न्यारी ।

 

स्पर्श अदृश्य कोमल सुगंधमय

हवा में सारंगी के तार की लय

झूम जाना चाहता हूं खूद

बातें भूलकर मैं सारी ।

 

हे मां, तेरी है शान निराली

आभा अद्भूत चमकत न्यारी ।

 

नैनों में एक दर्पण जैसे

हरियाली को खुद में समेटे

फू लों की सुगंध सांसों में भरके

झूम ये जाती है सारी ।

 

हे मां, तेरी है शान निराली

आभा अद्भूत चमकत न्यारी ।

 

-0-

नवलपाल प्रभाकर “दिनकर”

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.