#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

फैलाओ हरियाली

 

गर्मी की तपिस ने

मचाया कैसा आतंक

तालाबों को  सूखा दिया

पौधे किये तहस-नहस ।

खुद मानव ने ही

खोला मौत का दरवाजा,

छुपें कहां हम सभी

अब तो मरने का है इरादा,

मरने से बचाए कौन ?

था एक सहारा जो

खुद मानव ने उसको काटा

मानव के साथ – साथ

भुगतना पड़ रहा है ।

बेजुबान जीवों को भी

मरने का ये जुल्म ,

आज छोडक़र मानव को

मर रहे हैं जीव सैकड़ों

न स्वर्ग खाली है

न नरक ही ,

फिर से लगाओ पेड़

बढाओ धरती पर हरियाली

फैलाओ चारों और धरती पर

खुशहाली ही खुशहाली ।

 

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नवलपाल प्रभाकर “दिनकर”

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