#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

तुम्हारा सौंदर्य

 

तेरी आँखें

तेरा चेहरा

उतर गया

सीने अंदर

तोड कर

सारा पहरा

चेहरे पर

मद भरी

नशीली आँखें

नुकीली नाक

लाल कमल

पंखुरी से होंठ,

शरारती हवा

बार-बार

टकरा कर

छेडती तेरी

जुल्फों को ,

काली लट भी

इधर-उधर

लहरा कर

बिखरती हुई

चेहरे पर

और सुन्दरता

बढा देती है।

गोरे चेहरे को

और गोरा

बना देती है।

पूरा शरीर

ढला हुआ

किसी तरासी

मूर्ति -सा,

हर जगह

अलग-अलग

हर अंग

अपनी जगह

शोभायमान

हो रहा

हाथों का

अपनी जगह

अपना अलग

महत्व है।

टांगे भी

खिली-खिली

हरे कपडों

से ढकी

अपना महत्व

जता रही हैं

आगे पिछे

बढ कर ये

उन्हें ओर

लहरा रही हैं

वाकई तुम

क्या हो

क्या इन्द्र की

हूर हो

या फिर

आसमां से

उतरी हुई

तुम कोई

परी हो।

-0-

नवलपाल प्रभाकर “दिनकर”

 

 

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