#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

काव्य की खोज

 

शुद्ध काव्य की क्या खोज करूं

खुद जीवन अंधकारमय मेरा ,

पंक्तियां तैरती-डुबती सी हैं

धूमिल सा यह रास्ता है मेरा ।

गमों का सांया भंवर बन कर

तैरते हुए उन सभी अक्षरो को

और किंचित उन शब्दों को

अपने अन्दर समेट कर

अथाह गहराई में ले जाता ।

शुद्ध काव्य की क्या खोज करूं

खुद जीवन अंधकारमय मेरा ।

टुटे हुए शब्दों को बटोर कर

माना बनाता हूं मैं कविता

कहां मिलेगा इनको इनका

उतना स्नेह और अादर ।

जो इनको मिलना है होता

शुद्ध काव्य की क्या खोज करूं

खुद जीवन अंधकारमय मेरा ।

सरोबार पन रस वाक्यों को

कौन होंठो से लगाऐगा ।

पानी से बिखरे, भीगे शब्दों का

भला आस्वादन कौन करेगा ?

इनका स्वाद मानो है फीका ।

शुद्ध काव्य की क्या खोज करूं

खुद जीवन अंधकारमय मेरा ।

 

 

नवल पाल प्रभाकर “दिनकर”

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