#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

अन्जान हूँ

 

न कोई मंजिल है मेरी

ना ही कोई घर है,

मैं इस शहर में आनेवाला

एक शख्श अन्जान हूँ।

मेरी मंजिल कांटो भरी

शहर ये जंगल जैसा है

रास्ता ना कोई सूझे

इस जंगल में अन्जान हूँ।

मैं इस शहर में आनेवाला

एक शख्श अन्जान हूँ।

सर पर छत है पेड़ों की

नीचे खतरा जीवों का

जाऊं तो जाऊं कहां मैं

जंगल का मेहमान हूँ।

मैं इस शहर में आनेवाला

एक शख्श अन्जान हूँ।

आँखे निस्तेज डरी हुई सी

भय थिरकन से भरी हुई सी

खतरा हर पल लगा हुआ सा

गले में अटकी जान हूँ।

मैं इस शहर में आनेवाला

एक शख्श अन्जान हूँ।

-0-

नवलपाल प्रभाकर “दिनकर”

 

 

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