#Kavita by Nawal Pal Prabhakar

वश में करती रात्रि

 

रात्रि का तम

दूर करता हुआ

चंदा का प्रकाश,

मौन साधे गलियों की

चुप्पी तोड़ती हुई ,

हवा की सांय-सांय

ओर पत्तों की

हंसी किलकारियां ।

एकाएक………..

आंखों को

सम्मोहित करती है।

दूर से आती हुई

तालाब के किनारे से

मेंढकों की टर्राने की आवाज ।

शबनम की चंद बूंदों से

तृप्त हुई धरा के गर्भ में

पलने वाली नटखट

भंभिरियों की हृदय विदीर्ण

कानों को छेदने वाली

कर्कषता पूर्ण आवाज

एकाएक…………….

मन को

अपने वश में करती है।

-ः0ः-

 

नवलपाल प्रभाकर “दिनकर”

 

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