#Kavita by Neena Chhibbar

माँ से करती हैं बातें

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माँ से करती हैं बातें

बेटियाँ कहाँ कहाँ की

यहाँ की ,वहाँ की पूरे जहान की।।

 

घर के खनकते बर्तनों की

आँगन मे आती जाती धूप की

बालकनी के गीले सूखे कपडों की

कमरे मे आते जाते सायों की।।

माँ से करती हैं बातें……………

 

खुली आँखों देखे अधूरे सपनो की

मन मे खदबदाते तूफानों की

हर रोज गैस के चूल्हे पर चढते अरमानों की

अलसुबह मशीनी शक्ति मान बन जाने की

कभी कभी पूर्णतः कान और हाथ बन जाने की

अपने काल्पनिक पहिया जडे पैरों की ।।

माँ से करती हैं बातें ……….

चाहती है जानना कुछ  मसलों के हल

सीखती है बुनना ,माँ सम टुकड़ों से पूरा आसमान

पूछती है कैसे निभाती थी माँ सबको

हँसती, खनकती, खटती, पटती ,झुंझलाती कभी कभी

बताती है अपने नन्हो के बडे सवाल

सीखती है याद कर  दिनभर घूमती माँ से

बडी दूरियों को पास लाने का कमाल ।।

माँ से करती हैं बातें……….

 

करती है बकबक,चकचक,हँसती खिलखिलाती निरंतर

रूकती नही,सुनती नहीं,  पर चरखे सी चलती

जुबान पर,दिल पर, भावों पर,सचमुच नहीं है ताला

माँ बस सुनो ना, सुना क्या ,बस मेरी ही सुनो

कहती है हर शब्द वाक्य और बात के पहले

कभी धीमी, कभी तलखी ,कभी गीली आवाज मे

रोजमर्रा की गांठों को बतलाती है, सहलवाती है।।

माँ से करती हैं बातें…………

 

अनजाने ही पूछती है पुराने कपड़ों का माप

किसे किसे बाँटे सारा ,विस्तार से हिसाब

क्या क्या बनाया,घटाया, रचाया इस घर मे

प्यार से टोकती अभी मत रखना फोन

अभी बाकी हैं बातें  कुछ जरूरी जो याद आयीं

रूक बाद मे  कहती हूँ अब थक गई तू और मैं।।

माँ से करती हैं बातें…….

 

डा नीना छिब्बर

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