#Kavita by Nirdosh Kumar Pathak

सूबूत माँगता है आज ये जमाना।

ऊफ़! तेरे मेरे पैरों के निशां का।

क्या खूब हसीन था वो गुजरा

जमाना।

हक मांगते थे जब रेतों के मकां का निर्दोष

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