#Kavita by Nirdosh Kumar Pathak

जीते जी एक भयानक अभिशप्त बाप हूँ मैं।
लाचार बेरोजगार बेटे का बाप हूँ मैं।
बेटे की इच्छाओं को पल पल मरते देखा है।
बेटे को जवानी में बूढा होते देखा है।
उसके सधे कदमों को लड़खडा़ते देखा है।
भीड़ छोडो अकेले में बड़बडाते देखा है।
बम बंदूक गोलियों से कभी डरता नहीं मैं।
इन साधारण अस्त्र शस्त्र से कभी मरता नहीं मैं।
पर बेटे को विवश देख रोज रोज मरता हूं मैं।
वा बेबसी देख उसकी रोज रोज झुलसता हूं मैं।
बंद अनकहे होंठों के अनकही बात हूं मैं।
उफ़ !कभी न ढलने वाली भयानक रात हूं मैं।
शिथिल कंधों में नव दायित्व ढोने वाला बाप हूं मैं।
जवान बेरोजगार लाचार बेटे का बाप हूँ मैं।
निर्दोष कुमार पाठक
पेन्ड्रा रोड
9893453078

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