#Kavita by Nisha Gupta

  सीता की व्यथा कथा
सीता की व्यथा कथा कहाँ राम ने जानी थी
जानी भी थी तो दुनिया उससे अनजानी थी
सीता का मन चीत्कार उठा
जब राम दौड़ कर नही आये
सीता की प्यासी आँखों मे
कुछ मूक प्रश्न फिर  तैर गए
हे रघुनंदन हे प्राण प्रिय
क्यो कर न कदम बढ़ाते हो
कर नैनो को नीचे बैठे हो
क्यो न नयन उठाते हो
है मुख मुद्रा भी क्यो कर कठोर
क्यो ह्रदय मेरा अकुलाते हो
देख कठोर राम की मुद्रा
सीता का भ्रम भी टूट गया
ह्रदय स्पंदन जब नहीं सुना
तो विश्वासी मन डोल गया
थी पर पुरुष की कैद में मैं
तुम कैसे  ‘मुझे स्वीकारोगे
मन था इस पर विचलित मेरा
हे पुरुषोत्तम क्या तुम इस पर मोहर लगा दोगे।
खुद अपने से अब तक ना उबरे हो
तुम मुझे कहाँ उबारोगे
देखी होती गर मेरी पीड़ा
तुम दौड़ अशोक वाटिका को आते
माँ त्रिजटा से तो मिलते तुम
स्नेह आशीष माँ का पा जाते
बेटी सी विदा किया उसने
देख उसे मन धीर धरा जाते
इतने निष्ठुर कैसे हो प्राण प्रिय
नही समझ मैं पाती हूँ
तिनके का एक सहारा था मुझको
जिस पर वनवास गुजारा था
अब देख तुम्हे ये सोच रही
क्या ये ही राम मेरा प्यारा था
आह अग्नि परीक्षा नही पीड़ा
पीड़ा हैं मुझे अविश्वसो की
मैंने तुमको क्या समझा था
तुम कैसे पालन हार बने
नही की रक्षा तुमने मेरी
मेरी भी उसने भूल रही
पर तुम भी वन वन डोले हो
मैंने तुमसे ना कोई बात कही
तुम भी अग्नि में उतर आते
तो साथ परीक्षा हो जाती
हे राम तुम्हारे इस कृत्य से
तुम मेरी नजर में पुरूषोतम ही नहीं सर्वोत्तम हो जाते
तुम सच में सर्वोत्तम हो जाते
निशागुप्ता

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