#Kavita by Nisha Gupta

जीवन जीने की कला

 

 

अपने होठों पर छुपे कुछ राज बताना चाहती हूं

 

जीवन को जिओ प्यार और सचाई से ये बात बताना चाहती हूं

 

मुरझाता बचपन दिखे  जो कहीं तुमको

 

सवाँरो उसको ये जज्बात बढ़ाना चाहती हूं

 

गुलाबो सा महकता हो जीवन जिसका

 

वो महक थोड़ी दुसरो को भी दे

 

ये अलख जगाना चाहती हूं

 

बहता है जो आंखों से समंदर

 

किसी अपने से बिछड़ने के बाद

 

तड़प किसी और कि भी देखो

 

राहों से गुजरते हुए

ये अहसास जगाना चाहती हूं

 

रूखे से बाल सूखे से मुख

 

हाथ में फूल गुलाबो के, गुबारे सतरंगी लिए

 

मुरझाए से बचपन को फिर से

 

चहकाना महकना चाहती हूं

 

काश की मानवता चीर के सीना निकले

 

बस ऐसी अलख जगाना चाहती हूं

 

अरमान तो बहुत है मेरे दोस्तों

 

क्या क्या बयान करूं तुमसे

 

मिल जाए अगर हमसफर कोई

 

हमख्याल सा तो सच में

 

एक क्रांति सी लाना चाहती हूं

 

 

निशागुप्ता

 

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