#Kavita by Nisha Gupta

*घर मेरा घर*

आज प्रथम घर आई हूं

माँ का दुलार जी भर कर पाई हूं

हर बात पे कहती मुझको

बैठ बिटीया मैं लाती हूँ

माँ के पास आकर मैं भी

कितनी आलसी हो जाती हूँ

 

पापा से कर युहीं तकरार

अपना रोब जमाती हूँ

हर छोटी छोटी बात पर

उनसे अब भी रूठ जाती हूँ

जो पसंद है मुझको फिर

चुपके से जा बाजार पापा

मुझे मनाने को लाते है

करते रहते मनुहार मेरी

और कर कर के खिलाते है

 

वो ही बचपन मेरा लौट आता है

जो चाहा जी भर भर कर पाती हूँ

आँगन नाचता गाता सा लगता है

मेरे जाने के बाद सुना सुना हो जाता है

भरी आंखों से जब माँ पापा ये कहते है

तो दिल मेरा भी भर आता है

पर जाना होगा मुझको वापस

टिकट वापसी का लेकर आती हूँ

 

जिम्मेदारियां बहुत है उस घर की

जिस घर मात पिता ने भेजा है

हर बार एक सीख दे देती माँ

कैसे वहां सब को खुश रखना है

 

घर ये भी तेरा वो भी तेरा

जिम्मेदारी तुझ पर दुगनी है

बेटी तुझ पर है नाज मुझे

तू बेटी बन कर जन्मी है

दो दो कुलों की अमर बेल

तेरे ही दम पर बढ़ती है

 

जब समय हो अनुकूल तेरे

तब जब मन हो आ जाना

आँगना तेरा तेरी बगिया

आकर इसे सजा जाना

तू बड़ी बड भागन है

जो दो दो घर की मालिक है

बिटीया तू ही इस जीवन के

दोनों घरों की भव तारक है

 

निशा गुप्ता

 

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