#Kavita by Nisha Gupta

मकान को घर बनाती मैं

 

जो लाया मुझे द्वार अपने,

जीवन के रंग  सजा के

 

साक्षी बनाया सबको,

मांग मेरी सजा के

 

बहुत अलग हुआ जीवन मेरा

इस घर में आ के

 

माँ उठाती उस घर में

शोना मुझे बुला के

 

सोई नही रात भर में ये सोच सोच

न उठ पाई तो क्या होगा आगे

 

सुबह सवेरे द्वार जो खोला कुछ मैने शरमा के

नही समझ कुछ आया मुझ को

कोई तो आये बताने

 

आगे पैर बढ़ाये मैने दिल को ढांढस बंधाते

 

तभी आई एक चाय की प्याली

ये मुझ को बतलाते

 

आज तो बना दी चाय किसी ने

 

अब ये घर तुम्हारा तुम जानो कैसे काम सवारें

 

बस इतना ही सुनना था

आंखों में आंसू आये

 

भरे पूरे घर से आई मैं

भरे पूरे ही घर में

 

लिया तभी एक निर्णय ऐसा

 

सब काम खुदी कर पाये

 

माँ मेरी ने पाला मुझको

ढ़ेरों लाड लड़ाये

 

लाड़ लड़ाते लड़ाते

सारे गुर प्यार से सिखलाये

 

कर डाले काम सभी वो

जिनको हाथ न कभी लगाए

 

आज वही मैं घर की रानी

कोई मुझे न कुछ कह पाये

 

लड़ते झगडते जीवन को

हम दोनों हैं साथ बिताते

 

पर इतना नही अधिकार उन्हें भी

की स्वाभिमान को ठेस मेरे पहुंचाये

 

दिया स्वर्णिम जीवन काल मैने अपना

हर रस्म जीवन की निष्ठा से निभाते

 

समझ उनको भी है ये

घर नही है घर उनका मेरे बिन

 

ईंट पत्थर से चिन चिन कर वो चाहे  कितने ही महल बनाले

 

निशागुप्ता

 

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