#Kavita by Nitish Kumar Rajput

एक गीत के दो बन्द।।।

 

 

शांत सघन इक सूनेपन की क्या कोई कोलाहल हो ?

प्रश्न बहुत है जटिल हमारा जिसका केवल तुम हल हो।।

 

इन्द्रधनुष के रंगों में भी रंग न तुमसा मिलता है

और धरा की बगिया में न फूल ही तुमसा खिलता है

इस दुनिया में और स्वर्ग में अंतर केवल ऐसा है

दुनिया तो मुझसी दिखती है स्वर्ग तुम्हारे जैसा है।

 

मन अब तक ये सोच रहा है सच हो या कोरा छल हो।

प्रश्न बहुत है जटिल…….

 

आज भी न इतना जाना कि ऐसा क्यूं हम करते हैं

दुनिया से ही प्रेम है सीखा दुनिया से ही ड़रते हैं

दुनिया न जीने देगी तो घुट कर ही मर जाएगा

पर इतना भी तय है अपना प्रेम अमर हो जाएगा।

 

मांग लूं रब से या बिन मांगे मिल जाओगी वो फल हो।

प्रश्न बहुत है जटिल……

 

नितिश कुमार राजपूत

 

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