#Kavita by Om Prakash Agrwal Babua

तुम्ही से महकी है जिंदगानी

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किसी ने मुझको आँख दी है, किसी ने इनमे दिया है पानी

मुफलिसी मे अश्क को भी, पिया है हमने समझ के पानी

आज तुमसे मिल मेरा दिल, मुझसे यूँ कहने लगा

तुम्ही से लम्हे खिले खिले हैं, तुम्ही से महकी है जिंदगानी

 

जिंदगी की भोर भी जब, रात सी लगने लगी

और अपनी आत्मा ही, खुद मुझे ठगने लगी

तब खुदा ने ख्वाब मे, आकर मुझे कुछ यूँ कहा

तुम्ही से लम्हे खिले खिले हैं, तुम्ही से महकी है जिंदगानी

 

जब कली खिलने लगी, मधुमास भी आने लगा

दर्द क्या है दर्द का, अहसास भी जाने लगा

एक कतरा याद भी तब, आपकी कहने लगी

तुम्ही से लम्हे खिले खिले हैं, तुम्ही से महकी है जिंदगानी

 

अहले दिल की पीर हो तुम, अब मेरी तकदीर हो

अब मेरे तरकश का समझो, आखिरी तुम तीर हो

साँस के हर घूँट मे अब, यूँ मुझे लगने लगा

तुम्ही से लम्हे खिले खिले हैं, तुम्ही से महकी है जिंदगानी

ओम अग्रवालः बबुआ

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