#Kavita by Parmanand Raman

मैं लौटूंगा कस्तूरी बनकर

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काम से घर लौटते समय

नहीं लौटना चाहता मै घर

 

मेरे लौटने से पहले

घर वापस लौट चुका होता है

अपनी नींव की ओर

 

ठीक उसी समय एक ओर

जब समय लौट रहा है

अपनी रंगीन केंचुली में

 

प्रवासी पंक्षियों का झुंड

प्रवास के पश्चात

बजाय लौटने के अपने देश के

 

लौट रहा है सुदूर

धधकते ज्वालामुखी की ओर

 

सारा पटसन अनाज के बोरों से निकलकर

एक लम्बी रस्सी में लौट रहा है

 

और कपास के सारे फूल

चाँद की जमीन से धरती पर लौट रहें हैं

 

काला पड़ता जा रहा है चाँद

 

रात झुलसती हुई गलियों से होकर

मशालों में लौट रही है

 

इन्सान अदनवाटिका से निकलकर

लौट रहा है बस्तियों में

 

बस्तियां जहाँ से सदियो पहले

लौट चुके हैं देवता

 

भूख अंतडियों के पड़ोस वाली कोठर में

और प्यास हलक से होती हुई

आँखो के मरुस्थल में लौट रही है

 

मृत्यु टकटकी लगाए प्रसव पर

जन्म की ओर लौट रही है

 

द्रौपदी किसी रेशमी वस्त्र के बदले

लौट रही है अपने रक्त रंजित केश में

 

एक ईरानी लड़की

लौट रही है रक्त सने गुलाबी मफलर के

छोर पर काढ़े नाम के अक्षरों में

 

बर्फ पिघलने के बाद भी

झील में शिकारे नहीं लौटे

 

और निराश कृष्ण लौट रहे है हस्तिनापुर से

खाली हाथ

 

इससे पहले की तुम

अपने खोंईछे की हल्दी मलकर

अपनी काया में

 

लौट जाओ एक स्वर्ण मृग में

 

मै वापस लौटना चाहता हूं

तुम्हारी नाभि में

कस्तूरी बनकर

 

 

-परमानन्द रमन

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One thought on “#Kavita by Parmanand Raman

  • October 4, 2017 at 12:30 pm
    Permalink

    awesome poem bhaiya… very nice

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