#Kavita by Pawan Kumar sitapur

बरसात आगमन

 

आयी ऋतु बरखा रे, देखो मेघ कारे-कारे,

जैसे नैन कजरारे, मतवारे हो गये।

 

दादुर, मयूर बोले,तरु हो मगन डोले,

जिया झूमे हौले-हौले,रस मे डुबो गये।।

 

बरसे जो विकराल, भर गये सूखे ताल,

विटप की डाल-डाल,पात-पात धो गये।

 

ऐसी बरसात भयी,लागे धरा नयी-नयी,

तन की तपन गयी, ताप सब खो गये।।

 

पवन कुमार, सीतापुर

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