#Kavita by Pawan Vaishnav

लिखता तो वह भी है…!

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लिखता तो वह भी है

पर कोई उसे पढ़ता नहीँ
या पढ़ना चाहता भी नहीँ,
उसे किसी की
अब तक “वाह” या “खूब” जैसी प्रतिक्रिया नहीँ मिली।
उसने लिखा कि
चन्दन सा हो गया
सभी का मन
पर कोई मानने को तैयार नहीँ
सभी के दिमाग में बिछु जो है
वह लिखता है
धरती की जिंदगी

जी रही हैं औरत

पर औरत ही उसे मानती नहीँ

हर आदमी जो जी रहा है भूकम्प बन कर।

 

 

वह लिखता हुआ कई बार
अलौकिक हो गया था
उसका मन बादलों से ऊंचा उठा था
उसने अंतिम बची दिव्यता को स्पर्श किया था
लेकिन वह यह साबित नहीँ कर पाया
उसके पास साबित करने के लिए
कोई आयोजन नहीँ था
कोई वरदहस्त उसके शीश पर नहीँ था
कोई प्रकाशक उसे “उभरता” सा समझ नहीँ पाया था।

 

किसी वरीष्ठ,प्रसिद्ध,साहित्य के मूर्धन्य

लेखक ने उसे “अनचाहा अनुशासन” समझ

उसे उपेक्षित सा कर दिया

या वरिष्ठ को  भविष्य के भय से उसे अपना आसन

संकट में जान पड़ा,

उसने कभी उसे लिखने योग्य नहीँ समझा

उसे सिर्फ एक पाठक के फीते से बांधकर

उतना ही बड़ा करना चाहता है वरिष्ठ

जहाँ पर वह सिर्फ उसे पढ़ सके या सुन सके।

 

उसमें कवि होंना

किसी बगावत का संकेत लगता हैं।

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प्रेषक

पवन वैष्णव

बड़गाँव,उदयपुर

मब-7568950638

 

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