0217 – Prabhat Ranjan

Kavita :

पुत्री/बेटी को समर्पित

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होंठों पे तेरे हँसी देखकर

 

होंठों पे तेरे हँसी देखकर

एक सुकून सा मिलता है

चेहरे पे तेरे जो ये नूर है

एक फूल सा खिलता है

होंठों पे तेरे . . .

 

छोटी-सी, नन्ही-सी, प्यारी-सी

तू कोई परी लग रही

मासूमियत तेरे गालों पे

क्या खूब है सज रही

तेरी आँखों में आये जो आंसू

मेरा मन ये मचलता है

होंठों पे तेरे . . .

 

तू ही मेरी है लाड़ली तू ही

है मेरी जिंदगी

जब से तू आई है जीवन में

मुझको मिली हर खुशी

पल भर जो ना देखूँ तुझे तो

मेरा दम निकलता है

होंठों पे तेरे . . .

 

तुझको पढ़ाऊंगा, मंजिल दिलाऊंगा

अरमान है बस ये मेरा

नन्हीं परी मेरी पंख फैलाये तो

हो आसमां उसका सारा

सारे जग को करेगी तू रौशन

जैसे सूरज  निकलता है

होंठों पे तेरे . . .

 

सपने हजरों सजाया है

मैंने तो तेरे लिए

दुल्हन बनेगी तू जिस दिन

होगा दिन ख़ास मेरे लिए

कैसे तुझको करूँगा मैं रुख़्सत

दिल सोच के डरता है

होंठों पे तेरे . . .

 

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