#Kavita by Pradeep Mani Tiwari

रावण दहन….
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ख़ुद को बार बार हर बरस जलाते देख,
रावण हुआ हैरान परेशान हलाकान।
बोला हे आज के महारावण, तुम्हारी हरकतो पे मुझे भी शर्म आई,
बेशर्म सियासी गुण्डो भेंड़ियो,

रहम करो बेटियो पर शैतान।

माना कि मै दूध का धुला नहीं,

परन्तु ऐ नरपिशाचों,तुम कौन से गंगाजल के धुले हो
मै ढूँढ़ रहा कबसे इस भीड़ मे राम

अरे तुम ख़ुद पापी हो कर मुझे हर साल जलाते हो,
अरे मुझे जलाने के लिए तुम पापी नही,

चाहिए एक फिर से मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम
बस यही बात है कि अब न आयेंगे श्रीराम..

और तुम बरसो से जलाते रहे अधमों,इससे ही मै अब तक जला नहीं।

अरे पहले तुम खुद गिरेवाँ मे देखो
मुझे जलाने के लिए चाहिए श्री राम के रूप मे श्रीराम जैसा ही कोई राम।
ओजकवि प्रदीप ध्रुवभोपाली

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