#Kavita by Pradeep Mani Tiwari

नवगीत=======
विरह गीत गाऊँ मैं,चाँद या चकोर का।
तड़प रहा मन में,या ऐसे मन मोर का।
लाज रखूँ मन में,तो कैसे कह पाऊँ मै,
विरह ब्यथा अगनि लगी,कहो कैसे सह पाऊँ मैं
मीन सम तड़प जगी,पता न ओर छोर का।
दिन में जो हाल रहे,चकवी औ चकोर का।
विरह गीत गाऊँ मैं,चाँद या चकोर का।
भोर भये जाओ तुम,कब तक में आओगे
नेंह का संदेशा तुम,जाने कब सुनाओगे
पल भर में रात गयी,विरह वक्त भोर का।
मिले नहीं हल ये,दुख बादल घनघोर का।
विरह गीत गाऊँ मैं,चाँद या चकोर का।
अँखियन का नेह अश्रु, ब्यथा को बढ़ा,
दिनकर भी उदय होत,मानो मुँह चिढ़ा रहा,
देखि रुदन न पसीजा,हृदय कठोर का।
जोर चला जैसे अब,चहुँदिशि शोर का।
विरह गीत गाऊँ मैं,चाँद या चकोर का।
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ओजकवि शायर प्रदीप ध्रुव भोपाली,भोपाल,म.प्र.मो.9893677052-9589349070

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