#Kavita by Prakash Chandra Baranwal

मातृ – मंदिर के पुजारी, तेरी  आराधना, किस विधि करें

सरहदों के तुम हो रक्षक, तुझको, हम समर्पित क्या करें

 

आतंकियों ने, मातृ – मंदिर  पर, कहर बरपाया है

सैन्य बल ने धैर्य रख,सबको सबक सिखलाया है

हम हैं रक्षक, वो हैं भक्षक, उनसे क्या तुलना करें

मेरे सैन्य निष्ठा औ’ समर्पण, राष्ट्र हित अर्पित करें

मातृ – मंदिर के पुजारी, तेरी  आराधना, किस विधि करें

सरहदों के तुम हो रक्षक, तुझको, हम समर्पित क्या करे

 

आतंक को जड़ से मिटाने, द्वार पथ सैनिक खड़े

राष्ट्र – हित घर, मोह – माया, त्याग सीमा पर पड़े

आतंक के संघार हित, पल – पल  समर्पित हैं खड़़े

माँ भारती के लाल की, किस विधि वंदना हम करें

मातृ – मंदिर के पुजारी, तेरी आराधना, किस  विधि करें

सरहदों के तुम हो रक्षक, तुझको, हम समर्पित क्या करें

 

जिन सैनिकों – ने प्राण को, निज राष्ट्र हित, अर्पित किया

राष्ट्र को करना है चिंतन, बलिदान हित, उन्हें क्या दिया

हर भार ही होगा उठाना, मिल हम – सभी यह प्रण करें

शहीदों के प्रिय जनों हित ! मन-से सद्प्रीत औ’ श्रद्धा करें

मातृ – मंदिर के  पुजारी, तेरी  आराधना, किस  विधि करें

सरहदों के  तुम हो रक्षक,  तुझको हम  समर्पित क्या करें

 

इस प्रकाश के पर्व पर हमें, स्नेह – सुधा बरसाना है

अँधियारे को दूर भगा, खुशियों – के दीप जलाना है

जो प्राणों को अर्पित कर, स्वदेश हित, जीवन परित्याग किये

उनके घर कैसे वैभव, यश, बरसे, मिलकर हम सब यत्न करें

मातृ – मंदिर के पुजारी, तेरी आराधना, किस विधि करें

सरहदों के तुम हो रक्षक, तझको हम समर्पित क्या करें.

 

प्रकाश चन्द्र बरनवाल, आसनसोल

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