#Kavita by Prakash Chandra Barnwal

शिक्षा का महत्व

 

आओ, मिलकर  दीप  जलाएँ, श्रद्धा औ’ सदज्ञान के

फैले घर – घर में उजियारा, सद्साहस औ’ सम्मान के

 

जिस घर दीपक जला नहीं, निष्प्रभ वंचित हैं ज्ञान से

तमस न होगा दूर कभी, यदि जड़वत  हैं अभिमान से

 

बिना विद्या – अर्जन संतति को, सफलता मिले तो कैसे ?

शिक्षा  बिन,  रोशन  जहाँ न हो,  गुणवत्ता बढ़े तो  कैसे ?

 

भान कभी न हो  मन में,  शिक्षा की  क्या है  जरूरत

शिक्षा उन्नति का सोपान, साधक को इसकी जरूरत

 

गुमराह हुए जो युवक यहाँ, वक्त अपना बर्बाद किया

भटक गये जो बीच राह, निज भविष्य निस्सार किया

 

जो सफल हुए हैं, दिखता उनमें,  समुन्नत  ठौर – ठिकाना

मुखड़े से टपकता स्वाभिमान, जगमग रोशन आशियाना

 

होगा फलित तप अपना,  गागर में सागर का भरना

पूरी होंगी मुरादें सबकी, सजेगा अपना बाग सुहाना

 

बिन शिक्षा के जीवन में, दिखता है चतुर्दिक  धुप्प – अंधेरा

साधा औ’ किया है अर्जित जिसने, उनका है भाग्य सुनहरा

 

ऐसे योग्य  बनें जीवन में,  स्वतः  ढूढ़ता,  फिरे जमाना

ध्वज मंजिल पर फहराना है गर, परचम होगा लहराना

 

इस सफर में हजारों बच्चे, बुनते निज स्वप्न सुनहरे

दृढ़प्रतिज्ञ होकर जो साधते, पाते मोती सागर गहरे

 

उच्च – ज्ञान के अर्जन हित, निज मूलाधार सजाएँ

चमक दिखे उनके मुखड़े, स्व – निर्मित राह बनाएँ

 

भोला – भाला इंसा जब, बन जाता ज्ञानी विराट

अट्टालिकाएँ  निर्मित कर, देता वो भूमि को पाट

 

संभलो स्वतः आप, और सौरभ – सुगन्ध – को संवारो

निज ज्ञान – शिखा अर्जित कर, घर को स्वर्ग बना लो

 

प्रकाश चन्द्र बरनवाल, आसनसोल

 

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