#Kavita by Prakhar Dixit

संघर्षों में निखरा जीवन

विकल्प मिले कँह संकल्पों के
अमर्ष हुए विप्लव के मांनिद
छंट जाएंगे के दुख के बादल
संजीवनी सी ईश दुआ है।।

क्यों संकोचित दुखी हुए क्यों
कालचक्र का व्यपिक्रम जारी
अनुकूल बनेगी स्थितियाँ खलु
जिसने पुरुषारथ का चरम छुआ है ।।

झूठे जग का खेल निराला
बाहर गोरा अंदर काला
मिथक मिताई स्वार्थ विषैला
सब स्वारथ के अंधे मिलते
अपना यँह पर कौन हुआ है।।

कठिन डगर जीवन की प्रिववर
पग पग चुभते काँटे सत्वर
किंकर्तव्य विमूढ मनस यह
प्रखर ज़िंदगी धुआँ धुआँ है।।

उत्तिष्ठ मनस पुरुषार्थ करो
रस राग उमंग जोश भरो
अब आशाओं के खुले झरोखे
निज संघर्षों में निखरा जीवन
आगत खाई पीछे कुआँ है।।

प्रखर दीक्षित
फर्रुखाबाद

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