#Kavita by Prashant Singh Shishu

गीत ( मित्र तुम अभी न मानो हार)

 

थके बोझिल जीवन के तार

जिन्दगी करती है तकरार

इरादो ने तोड़ा जब दम

कहा चींटी ने मुझे पुकार

मित्र तुम अभी न मानो हार।।

दोस्त तुम अभी न मानो हार।।

 

अभी सूरज तक जाना है

अभी चंदा को सजाना है

अभी सागर के खारेपन को

पीने योग्य बनाना है

अभी करना है और विचार

मित्र तुम अभी न मानो हार ।।

दोस्त तुम अभी न मानो हार।।

 

अभी तो रंगमंच की धूम

अभी तो स्वर्ण पदक की चूम

अभी जब दुनिया जाये झूम

अभी जब थिरक उठे मन मोर

बजे जब पांवो से झंकार

मित्र तुम अभी न मानो हार ।।

दोस्त तुम अभी न मानो हार।।

 

अभी शोहरत अन्जानी है

जिन्दगी दर्द दिवानी है

खाक रस्तों की छानी है

जरा आंखो मे पानी है

अभी खुद को समझा लो तुम

अभी खुद होना है तैयार

मित्र तुम अभी न मानो हार।।

दोस्त तुम अभी न मानो हार।।

 

अभी तो अपने लोगों से

परायापन जीना होगा

अभी तो विधि के लेखों का

गरल हंस कर पीना होगा

अभी तो महका हुआ बसंत

करेगा पतझारी व्यवहार

मित्र तुम अभी न मानो हार ।।

दोस्त तुम अभी न मानो हार।।

 

 

अभी तो मीठी छुरियों के

गिरहकटवों से बचना है

अभी आंखो के काजल के

निकल जाने से डरना है

अभी रहबर होंगे रहजन

अभी तो धोखे देंगे यार

मित्र तुम अभी न मानो हार ।।

दोस्त तुम अभी न मानो हार।।

 

अभी हुनर तेरे सस्ते हैं तो क्या

लोग देख हंसते हैं तो क्या

तुम खुद राहों का चयन करो

पथरीले रस्ते हैं तो क्या।।

दो राहों को नव आकार

मित्र तुम अभी न मानो हार ।।

दोस्त तुम अभी न मानो हार।।

 

अभी जब आटोग्राफ बिकेंगे

हर दिन अखबार लिखेंगे

अभी दुनिया के हर कोने से

मधुरिम संदेश मिलेंगे

आये दिन टीवी पर होगा साक्षात्कार

मित्र तुम अभी न मानो हार ।।

दोस्त तुम अभी न मानो हार    – प्रशान्त सिंह “शिशू”

उन्नाव (उ0 प्र0  –   7053582550

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