#Kavita by Prashant Vaishnay

रंग बिरंगी लिखी पतंगे आसमान में छोड़ रहा हूँ

मकर पर्व की पावन संध्या, फिर से सबको जोड़ रहा हूँ…

 

कहाँ गए तुम सोनू मोनू चिंकू पिंकू टिंकू रिंकू

छत पर आओ गली में जाओ, दौडो़ भागो पकडो़ लूटो

देखो कट कर आई हैं ये जाने कहाँ से नई पतंगें

हाथ से सबकी डोर निकल गई, यूँ ही सब को छोड़ रहा हूँ..

मकर पर्व की पावन संध्या, फिर से सबको जोड़ रहा हूँ।।१।।

 

 

बचपन की यह मस्ती देखो कितनी है ये सस्ती देखो

ना कोई टीवी ना मोबाइल ना स्टेट्स ना प्रोफाइल

हर एक दिन त्यौहार नया है जब यारों का साथ मिला है

फिर वो शाम सुनहरी रख लो, देखो तुम पर छोड़ रहा हूँ..

मकर पर्व की पावन संध्या,फिर से सबको जोड़ रहा हूँ।।२।।

 

 

छोडो़ ये सब तो हैं यादें सीधा अब मुद्दे पर आओ

जिस पर लड़ते थे पहले हम उस पर भी कोई ध्यान लगाओ

मम्मी ने तिलकुट भेजा है गजक रेबडी संग रख कर के

जिसको खाना जल्दी कर लो मैं ना अब ये छोड़ रहा हूँ…

मकर पर्व की पावन संध्या, फिर से सबको जोड़ रहा हूँ।।३।।

 

रंग बिरंगी लिखी पतंगे आसमान में छोड़ रहा हूँ

मकर पर्व की पावन संध्या, फिर से सबको जोड़ रहा हूँ…

प्रशान्त वार्ष्णेय

 

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