#Kavita by Prashant Varshnay

*लाज तुम्हारी कहाँ बची अब,

उम्र के कच्चे धागों में..

कहाँ भागोगी कहाँ छुपोगी,

हैवानियति भरी बाजारों में…

चीख पुकारें कौन सुनेगा,

दूर सुदूर इलाकों में..

न्याय कहाँ तुमको दिलवायें,

सत्ता के गलियारों में…

 

बेबस माँ बस देख रही अब,

सूने अपने आँचल में..

कहाँ वो नन्ही कली खिलेगी,

बुझे हुए चिरागों में…

तुमसे पूछूँ लौटा दोगे क्या ?

फिर नन्ही मुस्कनों को

या तब तक तुम मौन रहोगे,

जलें और घरबारों में*

 

प्रशान्त वार्ष्णेय….

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