#Kavita by Praveen Mati

जिंदगी

 

एक हिसाब करना है

किसके लिए जीना है!!

किसके लिए मरना है ?

अपनों की भीड़ है अगर

तो मैं उदास क्यूँ हूँ ?

किसको सुनाऊँ “हाल-ए-दिल”!!

तनहाई के इतना पास क्यूँ हूँ?

वक्त बेचकर अपना

किसके लिए कमाता हूँ!!

खाने के लिए जीता हूँ !!

या जीने के लिए खाता हूँ ?

सारी दुनिया एक तरफ

शांति एक और है

कहने लगे वो भी एक दौर था

ये भी एक दौर है

प्रतिस्पर्धा की दौड़ में

हर कोई शामिल है

मकान की उंचाई बताती है आजकल!!

किसको क्या हासिल है?

वर्तमान में अक्सर पुराने

दौर की बात होती है

अंदर के अंधेरे को छोड़कर

हर छोर की बात होती है

पुरानी इमारत में

दरारों की तस्वीर ली जाती है

नई इमारतों में

युवाओं की तकदीर लिखी जाती है

सब मशरूफ हैं

अपनी-अपनी उलझनों में

कोई हारा हुआ है,कोई है विजेता

बहुत भीड़ रहती है सांसों की हर तरफ

मगर कोई भी गलती से

“जिंदगी” का कभी नाम नहीं लेता

कितना कुछ महसूस किया है मैंने

क्या अब भी “मौत “से डरना है

आज चलो बैठते हैं

जिंदगी तेरा हिसाब करना है

प्रवीण माटी

 

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