0219 – Preeti Praveen

Kavita :

ख़ुशनुमा पल

 

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आ भी जाओ ना इंतज़ार में हूँ

ख़ुशनुमा पल के दीदार में हूँ

 

पहले तो स्वयं आ जाया करते थे

मनपसंद उपहार भी लाया करते थे

 

रंग-बिरंगे परिधानों से सुसज्जित

मन ही मन ख़ूब इतराया करते थे

 

खाने खिलाने का दौर भी चलता था

कभी झूठी क़समें तो कभी झूठे वादे

 

बाँस की ये आरामदायक सी बिछात

सामने प्रकृति की मन मोहती छटा

 

घंटों इन दृश्यों को निहारते रहना

समय का पता ही नही चलता था

 

तुमने कई गीतों का स्रजन भी किया था

गाते-गाते तुम्हारे स्वर पलट भी आते थे

 

हरे पीले आसमानी रंग तुम्हें भाने लगे थे

चित्रकार की कूची ने भी यहीं,रंग भरा था

 

आ भी जाओ ना अब ये सूनापन खलता है

बैठे से दिखते हो,या ये मुझको छलता है

 

मौन शब्दों से ये तुम्हें पुकारा करता है

तुम्हारे आमद की बाट जोहता रहता है

 

बादलों ने भी तुम्हें ज़ोर से पुकारा है

आवाज़ तुम तक तो पहुँच रही है ना!

 

ये पत्ते ये हवाएँ शुभ संकेत दे रहे हैं

आ ही गए हो तो ये सकुचाना कैसा!

 

आओ बैठो मेरे पास जी भरके निहारूँगी

इस ख़ूबसूरती को फिर से तुम्हारे साथ

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डॉ.प्रीति प्रवीण खरे

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