#Kavita by Preeti Praveen

-“कसक”

कसक मन की बता दूँ तो

ज़माना ख़ौफ़ खाएगा

सुना दूँ दास्ताँ उसकी

तो ये दिल काँप जाएगा

 

आँख में आज भी है क़ैद

वो दिल से न जाएगा

वो मंज़र दिल को छलनी

रूह को घायल कराएगा

 

पड़ी थी दामिनी नीचे

लहू की धार बहती थी

क़ातिलाना वहशियों से

लाज की भीख माँगी थी

 

मानवता देखती रही

लाज लुटती वहीं रही

उन बेटों के गुनाहों को

ढॉंककर ताकती रही

 

दामिनी चीख़ती रही

ये धरती क्यूँ नहीं फटी

आसमां मूक दर्शक था

क़ानून ने पहनी थी पट्टी

 

इन्हें भी इस क़दर मारो

ना जिएँ मर ही पाएँ वे

सज़ा ऐसी उन्हें दे दो

मौत भी माँगें ना पाएँ

 

टीस बनकर चुभा है जो

निकाले से ना निकलेगा

कसक ना जीने देता है

वो मरने भी नहीं देता

140 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *