#Kavita By Prem Prakash

भवर में फसा हूं दोस्तों निकलना बहुत दुर्लभ है
मगर फिर भी दुनियां भर की डंस को झेलता हूं

न कोई मंजीर न कोई ठिकाना है दोस्तों
बस न जाने कौन सा खुशी ढूढ़ता हूं दोस्तों

बड़ी शिद्दत से मांगा उन्हें दोस्तों
अब ढलती उम्र में हिसाब मांगती है जिंदगी दोस्तों

कहां चैन मिलता है साहब इंसानों को दोस्तों
मगर ‘प्रेम’ यहां लोग घमंड बहुत करते हैं
प्रेम प्रकाश
पीएच.डी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय रांची झारखंड भारत।

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