#Kavita by Punit Shukla

बिटिया संस्कृति,

तुम आई और आकर चली गई,

न आकर ये जाती, बेशर्म यादें।

यूं तो तेरा मुझसे नाता नहीं है

पर शिक्षक हूँ भावुक, यही अवगुण है।

न जानें क्यूँ सिहर सिहर जाता हूँ मैं,

जब उभरता है अक्स तेरा सूने मन में।

धन्य है वो माँ, गर्भ ने जिसके तेरा सृजन किया था,

पर जीते जी वो मर गई ऐसा क्या अपराध किया था।

देर है अंधेर नही ऊपर वाले के दरबार में,

सज़ा मुकर्रर है उसकी जो शामिल तेरे अपराध में।

तुझे बचा न पाया यह समाज

यही अपराध इसका है।

रौशन ही करती तू, गर होतीं तुम आज,

अभी तो गिरनी है न जाने किस किस पर गाज़।

 

पुनीत शुक्ल

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