#Kavita by Raghvendra Singh

 

मैं हूं अनवर तेरा तू मुझको गुनगुनाओगी।

दूर होकर भी मुझको अपने पास पाओगी।

मैं हूं दीवाना तेरा तू मेरी दीवानगी,,,,,,,,,,

मेरी साँसों की महक में समा जाओगी।

 

अभी तो पास हूं तो हंस के मुझे जीना है।

दिल मेरा तेरे दिल का भीगा नगीना है।

मेरी बाहों की तसल्ली के लिए आ जा तू,

तेरे हांथो की चूड़ी बनके मुझे जीना है।

 

मैं वो पतझड़ हूं जो एक रोज तो आना होगा।

मैं वो छल्ला हूं जो तुमको पहनना होगा।

मैं तो खातिर तेरे धरती पे चाँद लाऊंगा,,,,,,,

बनके तारे मेरे ख़्वाबों से गुजरना होगा।

 

मैं तो खातिर तेरे जगता रहा इन रातों में।

मैं तो जीता रहा तेरे मख़मली जज्बातों में।

क्यो मेरा दिल मचल जाता है तेरे पास आकर,

कुछ तो जन्नत है तेरी प्यार भरी बातो में।

राघवेन्द्र प्रताप सिंह

(सीतापुर)

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