#Kavita by Raghvendra Singh Raghav

#मातृदिवसपरछोटासा_प्रयास

 

गीले बिस्तर में सो कर सूखे में मुझे सुलाया है।

खुद भूंखी रहकर के उसने रोटी मुझे खिलाया है।

 

मेरे आंशू माँ के पल्लू को गीला कर जाते थे।

छुप छुप कर रो लेती मम्मा हँसना मुझे सिखाते थे।

 

मैं उस माँ का बेटा हूँ जिसने डलिया ढोया है।

अपनी संतानों की खातिर अपने सुख को खोया है।

 

माँ का मतलब उनसे पूंछो जो अनाथ बन बैठे हैं।

मातृ दिवस को सुन सुन कर बिस्तर पर रो रो बैठे हैं।

 

बचपन मे जिस मां ने मुझको जूते मोजे पहनाया है।

अज्ञानी बालक तो मैं था चलना मुझे सिखाया है।

 

समझ नही आया अब तक वृद्धाश्रम क्यो खोले जाते हैं।

जिसने हमको बड़ा किया वो वहां क्यों रख्खे जाते हैं।

 

कलयुग के अवतारी बालक मां की ममता भूल गए।

अपनी शौकत शान की खातिर वृध्दाश्रम में छोड़ गए।

 

मंदिर, मस्जिद, बड़े शिवालों में क्यों दान ये करते हो।

घर मे जो भगवान खड़े हैं पूजा क्यों नही करते हो।

 

घर की मर्यादा को तुम अब घर का बोझ समझ बैठे।

जिसकी खातिर रोटी चलती उनसे ही छल कर बैठे।

 

कितना भी दुख दे दो उनको तुम्हें दुआएं देते हैं।

सुख दुख में सुमिरन तुम कर लो दुख सारे हर लेते हैं।

 

मात पिता की सेवा कर लो #राघव करे अपील है।

नही कोई भगवान कहीं हैं न ही कोई दलील है।

 

©राघवेन्द्र सिंह ‘राघव’

(सीतापुर उ. प्र.)

मो. 8874122059

Leave a Reply

Your email address will not be published.