#Kavita by Raj Malpani

घर में न हों दीवारें

तो यह पूरी धरती ही

घर हो जाती है,

मन में न हों दीवारें

तो हमारी सारी लड़ाई

गिर के खो जाती है.

हमारा मन भी तो

धरती जैसा ही है,

एक ही फैलाव है सब

आपस में जुड़ा हुआ,

गुंथा हुआ, घुला-मिला हुआ

लेकिन अपनी अपनी

दीवारें खड़ी करके

बाँट लेते हैं हम मन की जमीन

ठीक धरती को बाँटने की तरह.

लेकिन जैसे कितना भी बाँट कर

बंटती नहीं है धरती

वैसे ही नहीं बंटता है मन.

धरती जब भी हिलती है

ढह जाती हैं सब घरों की दीवारें

और फिर से एक हो जाती है धरती.

किसी एक कोने से उड़ा

धूल का कोई कण

कहीं भी विराज सकता है

ऐसे ही मन के किसी भी

कोने में कहीं भी जब कोई

हलचल होती है तो

हिलती है मन की पूरी जमीन

बिना किसी दीवार की

परवाह किये…

मन से पार कोई नहीं जाता,

बस मेरा मन और तेरा मन

जो घिरा होता है दीवारों में

वो ढह जाता है एक दिन,

जैसे अपने घर से निकल कर

हम पूरी धरती के हो जाते हैं

वैसे ही अपने मन से निकल कर

हम पूरे मन के हो जाते हैं

जिसे अपने अपने जिस्म में

सब महसूस करते हैं

अपनी दीवारों में कैद हो गयी

धरती की तरह… घर में न हों दीवारें

तो यह पूरी धरती ही

घर हो जाती है,

मन में न हों दीवारें

तो हमारी सारी लड़ाई

गिर के खो जाती है.

हमारा मन भी तो

धरती जैसा ही है,

एक ही फैलाव है सब

आपस में जुड़ा हुआ,

गुंथा हुआ, घुला-मिला हुआ

लेकिन अपनी अपनी

दीवारें खड़ी करके

बाँट लेते हैं हम मन की जमीन

ठीक धरती को बाँटने की तरह.

लेकिन जैसे कितना भी बाँट कर

बंटती नहीं है धरती

वैसे ही नहीं बंटता है मन.

धरती जब भी हिलती है

ढह जाती हैं सब घरों की दीवारें

और फिर से एक हो जाती है धरती.

किसी एक कोने से उड़ा

धूल का कोई कण

कहीं भी विराज सकता है

ऐसे ही मन के किसी भी

कोने में कहीं भी जब कोई

हलचल होती है तो

हिलती है मन की पूरी जमीन

बिना किसी दीवार की

परवाह किये…

मन से पार कोई नहीं जाता,

बस मेरा मन और तेरा मन

जो घिरा होता है दीवारों में

वो ढह जाता है एक दिन,

जैसे अपने घर से निकल कर

हम पूरी धरती के हो जाते हैं

वैसे ही अपने मन से निकल कर

हम पूरे मन के हो जाते हैं

जिसे अपने अपने जिस्म में

सब महसूस करते हैं

अपनी दीवारों में कैद हो गयी

धरती की तरह…

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