#Kavita By Raj Malpani

महिला दिवस,…

समाज की तमाम
साजिशों को तोड़कर
और अपने भीतर डाले गये
औरतपन को छोड़कर
जब कोई औरत
जीना शुरू करती है
तब वो एक ऐसी
शक्ति बनती है
जो ज़िंदगी के बेमानी से
खाली खोखले लफ्जों
में धीरे से उतरती है
एक गहरे मानी की तरह
और ज़िंदगी की
सूखी बंजर जमीन पर
वो बरसती है पानी की तरह.
वो आज़ाद रूह औरत
अपने जिस्म की कैद से बाहर
ज़िंदगी के दरिया में
उतरती है रवानी की तरह
और सबके भीतर बसती है
सबकी अपनी अपनी
खूबसूरत कहानी की तरह…

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