#Kavita by Raj Malpani

रंग भी कितने
अजीब होते हैं,
ढूंढते हैं हम जिन्हें
बहुत दूर कहीं
वो अक्सर हमारे
बहुत करीब होते हैं.
रंग किसी के
भीतर लिपटे होते हैं
तो किसी के ऊपर,
ऐसे ऐसे रंग
जिन्हें देखते देखते
उम्र गुजर जाती है.
जाने कितने रंग
लपेटे थे उसने अपने ऊपर…
वो बैठा तो
रंग अलग था
और जब वो उठा तो
रंग अलग था,
वो खामोश था तो
एक अजीब सा रंग था
और जब वो बोला
तो वो रंग
और भी अजीब था…

जय हिंद!
जय भारत!!

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