#Kavita by Raj Malpani

आख़िर कब तक,
कब तक तुम्हें मनाऊँ
जानते हो कब से
तुमको आवाज़ देते रहा,.
सोचा कभी तुमने,..
अकेला कब तक रहूँ
साथ के इंतज़ार में
आज फ़ैसला किया है
याद रहे,. तुमको
जब तक तुम हो
तभी तक हुँ साथ
जिस दिन तुम
अपनी राह बदल
लोगे उस वक़्त से
मैं भी अपनी राह
बदल लूँगा,…….
पीछा नहि करूँगा
ना ही इसकी वजह
पूछूँगा क्या पुछू ?
कोई शिकवा नहीं
कोई शिकायत भी नहीं
चुप हो जाऊँगा मैं भी
उसी तरह जिस तरह
तुम हुई हो,…….
नहि माँगूँगा अब अपने
प्यार की भिक न हक़
तुम मुझमें पहले भी थी
तुम मुझमे अब भी हो.
फर्क बस इतना है, की
पहले मेरे लफ़्ज़ों में थे,
अब खामोशियों में हो.
जानते हो आप भी की
प्यार ख़ैरात में नहीं
सोगात में मिलता है,

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