#Kavita by Raj Shukla Nmr

Raj Skhukla Nmr

 

जिंदगी  के  चलन  से  मैं डरता  रहा

नन्हाँ दिल दिल ही दिल में सिहरता रहा

 

थी मेरी रब ने मेरे लिए दी थी सो

उसने जो भी कहा वो मै करता रहा

 

जान कर बूझ कर ये गलत मोड़ है

उसकी मर्जी के कारण विचरता रहा

 

मै तो बंधन में था फिर भी दुश्मन जहां

सारे   इल्जाम   मुझपे   ही धरता   रहा

 

हाल बेहाल होता रहा हर समय

कहने को तो जमाना सुधरता रहा

 

इसलिए पाँव जख्मी हैं मेरे कि मैं

कंटको की गली से गुजरता रहा

 

राज शुक्ल “नम्र”

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