#Kavita By Rajan Mishra

जयद्रथ
चक्रब्युह के क्रूर कपट से
धड़क पड़ी है आग जयद्रथ
गांडीव की डोर तुम्हारी ओर
तनी है भाग जयद्रथ।।

कल अभिमन्यु साथ किया था
बहुत बड़ा अपराध जयद्रथ
एक बालक को किया निहत्था
मारा जैसे ब्याध जयद्रथ।।

अभिमन्यु की चिता जली है
जला पार्थ का प्राण जयद्रथ
उसी अग्नि में तप्त किया है
तेरे ख़ातिर बाण जयद्रथ।।

बाण पार्थ की प्रत्यंचा पर
बैठा निष्ठुर नाग जयद्रथ
जान बचा के अब तू अपना
भाग सके तो भाग जयद्रथ।।

हो प्रचंड जो सभी मनुज में
जल-थल-नभ में देव दनुज में
अपनें प्राणों में पिघलाकर
उन्हें बना ले ढाल जयद्रथ
किन्तु आज सब ब्यर्थ रहेगा
आ पहुंचा है काल जयद्रथ।।

जा टटोल के आ त्रिलोक को
जिसमें हो अनुराग जयद्रथ
दे सकता हो अगर कोई तो
अभयदान ले मांग जयद्रथ।।

सप्त-महारिथिओं ने छल से
घेर किया था वार जयद्रथ
द्रोण- दुःशासन- दुर्योधन
कृप-कर्णो को धिक्कार जयद्रथ।।

आज सभी को लामबंद कर
अर्जुन सम्मुख टिका जयद्रथ
कल अभिमन्यु साथ किया जो
आज वही कर दिखा जयद्रथ।।

सौगंध भरी सौभद्रे की
यह अटल मृत्यु की रेख जयद्रथ
बाण-अग्र पर काल-सर्प है
दृग हो तो यह देख जयद्रथ।।

अर्जुन ने सर छोड़ दिया फिर
लक्ष्य सामने साध जयद्रथ
बीचों-बीच महारिथिओं के
कट गया आधे-आध जयद्रथ।।

पड़ा भूमिपर धड़,मस्तक जा गिरा
पिता की गोद जयद्रथ
दंग रह गये द्रोण-कर्ण सब
कर न सके प्रतिरोध जयद्रथ।।

अभिमन्यु से क्रूर-कपट का
पाया है परिणाम जयद्रथ
गांडीव की डोर शिथिल हो गयी
गया सुरधाम जयद्रथ।।

जय-जयकार उठा अम्बर तक
पूर्ण हुआ प्रण पार्थ जयद्रथ
अन्त विजित होता ही है वह,
लड़ता जो सत्यार्थ जयद्रथ।।

कृत- रंजन मिश्रा

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