#Kavita by Rajeev Kumar Das

ज़िंदगी की ज़िंदगी तक बहुत उलझन है

संघर्ष करना होगा जब तक अपना तन है

 

कोई भूखे के लिए ज़िंदगी जी करके देख

सुकून मिलेगा रोटी जिसकी हर धड़कन है

 

उसके हालात समझ वो कैसे काटती उमर

सरहद की गोलियों पर जिसका साजन है

 

मछलियाँ सागर में जिएँ तो क्या हो गया है

सिर्फ़ मोतियों के बीच उसकी भी तड़पन है

 

विवेक के पुतले तुम क्यूँ हो जाते हो बेबस

कायनात के जीवों में उलझन ही उलझन है

 

नहीं दूर रह पाओगे तुम मुद्दत् से दूर ‘राजीव’

दुनिया का नाम ही सदा मोह माया बंधन है

@राजीव कुमार दास

हज़ारीबाग़ झारखंड

 

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One thought on “#Kavita by Rajeev Kumar Das

  • December 11, 2017 at 6:18 am
    Permalink

    बहुत अच्छी कविता है सर

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