#Kavita by Rajeev Kumar Das

उनसे बढ़कर ख़ुशियों का संसार नहीं माँगी थी,

करवा चौथका त्योहार ही तो माँगी थी।

हसरतों में बन जाते गर अरद्धनारीश्वर

यही एक उपकार ही तो माँगी थी।

लाज़िमी क्या थी,ज़माने भर लूटाने की,

पूरी दुनिया का प्यार ही तो माँगी थी।

क्या ख़ता की,ज़िंदगी भर के लिए,

पुरुष एक बार ही तो माँगी थी।

सिर्फ़ मेरा ही नाम धड़के सीने में,

यही बार-बार ही तो माँगी थी।

क्यूँ हर साँस पे इम्तिहान देती हूँ मैं”?

मैंने अग्निसंस्कारही तो माँगी थी।

जश्न में रहे जो बाज़ारों के रौशनी तले,

सूखे गले,उसी चॉंदका दीदार तो माँगी थी।

उनसे बढ़कर ख़ुशियों का संसार नहीं माँगी थी,

करवा चौथका त्योहार ही तो माँगी थी।

@राजीव कुमार दास

हज़ारीबाग़ झारखंड

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