#Kavita by Rajeev Kumar Gupta

सुकून से बैठे हैं घरों में,

बिना किसी फिकर के,

याद नहीं है ये सुकूं क्यों है,

बस याद तो करो,

याद तो आती तब ,

जब होते जज़्बात दिल में,

पूछो मेरे वतन से,

कितनी शहादतों से,

सुकूं अपने अमल में आया,

अमन के दुश्मनों को बता दो,

खादी वालों को समझा दो,

ये देश है अमन का,

पहने खादी, बने नेता,

सबको बनाते हैं धेता,

नीति को जल्द बदलो,

देश को सुधारो,

वतन पे शहादतों को,

अनायास ही बेजा न करो,

होली, दीवाली पे घर में,

सुकूं से है हम,

पर नहीं जानते,

सीमाओं के हालातों को,

सीमाओं से दुश्मनों से,

लोहा लेते हैं वो,

शहादत देकर, सुकूं दिलाते हैं,

इतने खुदगर्ज़ न बनो,

अपने साथ देश को भी देखो,

जब अपनी मय छोड़कर,

जब मैं सुधरुंगा, तो

तो मुझे ओर देश में सुकूं होगा

यही चाहिए देश में सुकूं के लिए

~ राजीव

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