#Kavita by Rajendra Bahuguna

बसन्त – उत्सव

हर ठूंठ  में पत्ते  नये, निज कोंपलो  को खोल कर

पुष्प   में  भौंरे    भँवर   से   गूंजते   कल्लोल कर

नवपुष्प, पल्लवित  कर छटा, बिखेरती  है ये धरा

मरूधान  को   मरूस्थलों  सा भी ये करती  है हरा

 

कंत  कलरव  बोलियों  सी, ये  बसन्ती चोलियां है

बोलते  है पन्थ ,पादप, सन्त सम- रस बोलियां है

मौन स्वीकृति का निमन्त्रण  भी बसन्तों ने दिया

अंकुरित बीजों में पुष्पित पल्लवित जग कर दिया

 

मौसमों   का   ये   प्रणय,  परिधान   ही  प्रमाण है

हरियालियों में भी  हरित  है,ये  त्वरित परित्राण है

ये वशुन्धरा  ही  मूल  से  पावन प्रकृति  पालती है

मानवों के  मन – मुताबिक, मौसमों  को ढालती है

 

पीताम्बरों से पथ,पथिक  सत्  मत् रथों के सारथी

छट – पटाती  सी छटा,छन – छन   क्षति  संवारती

अंकुरित  पौधे   भी   पादप,  टकटकी  से  देखते है

आस  के  उल्लास के  अवसान सुर-स्वर  फेंकते है

 

जिस  तरह हम भी पुराने तन   कफन से छोडते हैं

नवजीव  जीवन जन्म  लेकर,वस्त्र नूतन ओढते हैं

ये बसन्त – उत्सव  हमें  वो, चेतना  समझा रहा है

हर  सफर में जीव का  जीवन  जगत मे  आ रहा है

 

मन-मुटाओं के  मजहब  के  मञ्जरों  में  मत पडो

सल्तनत,  सत्ता,  सियासत  के  सरों  में  ना सडो

यहां हर तरह के वृक्ष ,धरती ,जंगलो  में  पालती है

जल, मूल से भोजन जुटा कर हर उदर में डालती है

 

यंहा मारूत  की  टंकार  से ,पादप  बराबर खेलते हैं

इस धूप, गर्मी,छाँव  के  हर घाव   निर्भय  झेलते हैं

इन सम्प्रदायों की  तरह वो  श्वान से  लडते नही हैं

ये वाशनाओं  के  शवो  की सल्तनत  पढते  नही है

 

कोंपलों, कलियों  की शाखाओं से तो कुछ सीख लो

इस प्रकृति  की  प्रखर  प्रतिभा से कुछ तो भीख लो

बस, पुष्प से खिलते रहो  इस प्रफुल्लित बांगवा में

प्रेम से मिलकर गले,बस, चलते रहो इस कांरवा में

 

क्या कभी मानव,बसन्त को समझकर भी जीयेगा

क्या कभी  नीरस, मनु  रस मौसमों का भी पीयेगा

बारह  महीनों  की  ऋतु,इस सृष्टि  को  संवारती है

बस,ये ऋतु  ही ‘आग’  की  आराधना  है, आरती है!!

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)

मो0 9897399815

 

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