# Kavita by Rajendra Bahuguna

भारत की सियासत
जनता,नेता, अभिनेता सब बिक जाता है
प्रजातन्त्र का कूडा करकट दिख जाता है
प्रजातन्त्र में सबकी अपनी औखातें हैं
इस राजनीति में नेता बातो की खाते हैं

यंहा बडे.- बडे नेताओं की लगती है बोली
देखो जनमत की ये कैसी आँख मिचैली
जनता की ताकत से नेता बन जाता है
ये चौराहे में बिकता है बस, धन खाता है

ये हिन्दू, मुस्लिम सम्प्रदाय के देखो पंगे
इस भारत मां थाम रहे है लावारिस नंगे
भिखमंगे भी अपने-अपने दावे ठोंक रहे हैं
ये प्रजातन्त्र के परमिट देखो भौंक रहे हैं

एक चना भी भाड़ फोड़ कर दिखलाता है
प्रजातन्त्र की इज्जत का ये बईखाता है
इन सबका अब बाप यंहा पर पैसा ही हैे
ये राजनीति है, इसमें सब कुछ ऐसा ही है

डेढ़ अरब की जनता ने ये इतिहास बनाया
फिर से पागल पन का जनमत कैसेे आया
बस,जनता,कारण बनती है इस बर्बादी का
अब जुगाड़ का खेल,खुशामद में खादी का

इस राजनीति में जयचन्दो की देखो लीला
आज सियासत सड़ा रहा है कौम कबीला
क्यों बे-भाव का माल,कीमती बन जाता है
कमजोरी में गधा बाप क्यों कहलाता है

इस लोकतन्त्र का पत्थर हीरा काट रहा है
यहां भारत को तो लावारिस ही चाट रहा है
यंहा प्रधानमन्त्री कौन बनेगा ये भी पंगे
इस झूठी मान ,प्रतिष्ठा, में सब नेता नंगे

लगे हुये हैं जोड़ -तोड़ में सभी खिलाडी
यंहा जितने उॅंचे पर्वत उतनी गहरी खाडी
इस लक्षा-गृह में लावारिस नेता फिर लौटे
राजनीति की सत्ता में अभ्यस्त मुखौट

यंहा उॅंट,अष्व,प्यादे सतरञ्जी खेल रहे हैं
यंहा अपने – अपने सभी खटारा ठेल रहे हैं
अब तो केवल एक्सीलेटर धूॅंआ छोड़ रहा है
पटक-पटक कर सिर कुर्सि से फोड़ रहा है

जो जितना उँचा नेता,उतनी नीची भांषा
ये हीरा भी तो हमने ही चुन-चुन के तरासा
बात विकास की,पर विनाश पर ही चर्चा है
इस अय्यासी पर भी जनता का ही खर्चा है

गैस,तेल की कीमत नित बढ़ती जाती है
नीरव,माल्या,मोदी की कितनी ख्याति है
क्या चोर,उचक्के,डाकू भारत के मालिक है
प्रजातन्त्र हम जनता के मूँह पर कालिख है

हम मुर्दे भी कफन इन्ही का ही खोलेंगे
फिर कन्धे में मुर्दा ढोयेंगे और जय बोलेंगे
इन सडी लाश में भारत माता को खंगालेंगे
पांच साल तक हम ये मुर्दे फिर से पालेंगे

क्यों सभी जूगाडू सत्ता ने सिरमोर बनाये
जो प्रजातन्त्र में हारे हम पर हुक्म चलाये
आज नपुंसक राजनीति से क्या आशा है
ये कवि आग की आग धधकती परिभांषा है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

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