#Kavita by Rajendra Bahuguna

विद्धता का अपमान
विकृति से धर्म को हम क्यों जलाते आ रहे हैं
आड़ में श्री राम की क्यों संस्कृति खा रहे हैं
लक्ष्य रावण को बना कर रामलीला हो रही है
राम के इस देश में क्यों आदमियत खो रही है

विद्धता लंकेश की कब तक दबाते जाओगे
राजनीति से सनातन गीत कब तक गाओगे
हम ब्रह्म-विद्धा फूंकते हैं राम के सम्मान में
देख लो जमघट असुर के आज हिन्दुस्तान में

कैद में थे ,दश ग्रह, दशग्रीव के , तप से पड़े
भाष्कर और भौम भी थे द्धार पर हरदम खड़े
संहीता और ज्यातिषि,ग्रह,काल भी था हाथ में
अभिशाप को मैं देखता हॅूं ब्राह्मणो की जात में

शास्त्र में लंकेश की हर संहीता का मान है
शिव के ताण्डव की श्रुति का धर्म में सम्मान है
लंकेश को तो मोक्ष पाना ही बहाना राम था
क्यों धर्म के ही आसियाने में मचा कोहराम था

कर दिये दश शीश अर्पण ब्रह्म के सम्मान में
हो गया र्निवंश ,अपनी अस्मिता की आन में
लंकेश के नाम को व्यभिचार से क्यों जोडते हो
शास्त्र की अवधारणा अज्ञान से क्यों मोडते हो

क्या उदाहरण एक भी लंकेश के व्यभिचार का
केवल बहाना मिल गया आदर्श के उपचार का
लंकेश के घर आज भी रघुवंश का सम्मान है
बन गया मरघट ,धर्म से आज हिन्दुस्तान है

उद्घोष माता से किया , वैदेही का लंकेश ने
मातृत्व को कलुषित किया है आज मेरे देश ने
फूॅंकते हैं धर्म को ,हम धर्म की ही आड़ में
क्यो धर्म-ध्वज के चीथड़े लटके पडे हैं झाड़ में

चौराहे पर लंकेश को ना इस तरह से फूॅकिये
दिल, दिमागी गन्दगी आकाश में ना थूकिये
ज्ञान से अपने विकारों को तो पहले धोइये
आर्दशता की आड़ में ना बीज ऐसे बोइये

संस्कार रावण का किया ,राम ने निज हाथ से
कुछ ना कुछ तो सीखिये वक्त के हालात से
एक भी व्यभिचार का कुछ तोउदाहरण दीजिये
विद्धता को इस तरह अपमान तो मत कीजिये

इस राम-रावण वैेरता के मर्म को पहचानिये
उस शास्त्र से लंकेष की समृद्धता को जानिये
कब तलक आर्दश के पुतले जलाते जाओगे
देश को व्यभिचार से अब औेर कितना खाओगे

एक भी रावण अगर ,इस देश में हो जायेगा
ब्रह्म भी मजबूर हेै अवतार लेकर आयेगा
दूर होगी धारणा ये भ्रष्टता व्यभिचार की
सत्य और सम्पन्नता से बात होगी प्यार की

आदर्शता तो राम, रावण की बराबर चाहिये
समकक्षता में वीरता और विद्धता को लाइये
देव,दानव की ये गाथा आज हम क्यों गा रहे हैं
वेद में इतिहास में हम भेद क्यों दिखला रहे हैं

यंहा देव दानव गुप्त हैं हर जीव के संस्कार में
सम्पन्नता के राम रावण अब कहां संसार में

इस अश्लीलता के मंञ्च पर आदर्श को लाइये
कवि आग को तो विद्धता के राम-रावण चाहिये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815

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