#Kavita By Rajendra Bahuguna

यह एक गम्भीर प्रश्न है,जिसको कविता में गूंथ कर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
होली
ये राष्ट्र-पर्व होली है क्यों प्रहलाद नही है
दुनिया में बंजर धरती हैे बस,खाद नही है
सत्यविहीन सासन ही जग में आज भला है
सदियों से तो भारत में प्रहलाद जला है

मैे भी अनुभव से ये जीवन देख रहा हॅूं
मृग तृष्णा के स्वप्न दृष्टि से फेंक रहा हूॅं
देखो मानव की, पल-पल परिवर्तित बोली
जंग समर्पित आज जगत में कैसी होली

मानव का आधार मनु ने फाग रचा था
हर मजहब लय, छन्द बद्ध हो राग रचा था
धरती से मानवता मरती , क्यों जाती है
ये खूनी होली भारत को ही क्यों भाती है

आतंकवाद तो हम सब के दिल में पलता है
राजनीति से देश नही ,घर- घर जलता है
सरहद में कम ,सड़कों पर चलती है गोली
क्यों खेल रहा है मजहब,ऐसी खून की होली

हम सब गोर्वधन गिरधारी की होली गायेंगें
अब चौराहों पर मन्दिर,मस्जिद को लायेंगें
छोड़ो इन प्रहलादों को बस, रक्त बहाओ
आओ, जयचन्दो, भारत में आग लगाओ

क्यों परम्परायें मुर्दों की हम झेल रहे हैं
ये मजबूरी है मिल कर होली खेल रहे हैं
इस राजनीति ने देखो क्या जेहाद रचा है
इतिहास गवाह हैजलकर भी प्रहलाद बचा है

ये बचपन, यौवन,बृद्ध अवस्था भेद मिटाओ
यहां पुनः अंकुरित शैशवता के मानव लाओ
हम जोली ये होली फिर से बन जायेगी
इस मानवता की फसल धरा में लहरायेगी

इन त्यौहारों के मर्मस्थल भावों को जानो
इस परम्परा की त्वरा मर्म से भी पहचानो
फिर होली और दीवाली हो या रक्षा-बन्धन
बस,मानवता में मानवता का ही हो क्रन्दन

क्यों आज देश में घर-घर में होली जलती है
प्रहलाद हुआ है भस्मि-भूत,होली पलती है
हिरणाक्ष, कंस,रावण को दिल से दूर भगाओ
कवि आग प्रहलाद बनो कुछ ऐसा गाओ !!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

Leave a Reply

Your email address will not be published.