#Kavita by Rajendra Bahuguna

अब प्रमाण जुटाओ

अगर मुहम्मद में  दम-खम है,आये  और मस्जिद से बोले

राम अगर कंही  देख  रहा हो,चुप  क्यों है अपना मूंह खोले

फिर हनुमान भी संस्कारो से मन्दिर और मस्जिद में डोले

अब अल्लाह,ईश्वर दोनो मिलकर भक्तो की औकाते तोले़

 

क्यों मिट्टी गारे की सीमा में, हम  अल्लाह   को बांध रहे हैं

क्यों प्रभू राम  की  छाती को हम कुचल  रहे हैं, फांद रहे हैं

जिस  मुल्ला  ने अल्लाह देखा आये  और  उद्घोष करे ना

अगर  राम  हिन्दू  में रमता, अब  आये आगे जोश भरे ना

 

अल्लाह ,ईश्वर  के  भक्तो में   कंही  कोइ  तकरार नही है

इस पूजा,पाठ में  और नमाज  की, परिपाठी में रार नही है

भाव एक  है, भजन  एक  है, बन्धन  का  कोई तार नही हेै

कंही भगवानो में  भेद नही है ,पर भक्तो  में  प्यार नही हेै

 

रावण  का  वध  करने  वाला ,खुद  धरती  को तरस रहा है

मौलवी,मुल्ला  आज  कर्बला  के   नायक  पर बरस रहा हेेै

ब्रह्माण्ड का  मालिक भी  मन्दिर  का  झगडा  झेल रहा है

आज मुहम्मद, मुल्ला की  कठपुतली  बनकर  खेल रहा है

 

रसखान कृष्ण को गाते-गाते  अल्लाह-ताला  में मिलता हैे

अस्तित्व  ब्रह्म  का  दादू, मीरा,और  कबीरा  से हिलता है

भजन हृदय की अभिव्यक्ति है,पुण्य भाव से ही खिलता है

वैमनस्य  की  भाव-शून्यता से  ईश्वर  अल्लाह छिलता हेै

 

राम, मुहम्मद  मुजरिम बनकर,न्यायालय को भोग रहे हैं

इस कलियुग में  मन्दिर ,मस्जिद  भक्तों के उद्धोग रहे हैं

उस कुदरत  के  न्यायाधीश  की  आज  पैरवी हम करते है

क्या चमत्कार है अल्लाह,ईश्वर, आज वकालत से डरते हैं

 

अवध  का  नन्दन  आज  टाट में  बैठा जीवन काट रहा हेै

क्यों अल्लाह  का बन्दा  मुल्ला,गुम्बद को ही चाट रहा हेै

हिन्दू, मूस्लिम  धर्म  नही है राजनीति  का  खेल हो गया

अब परं पिता  परमेश्वर  मानवता के  आगे  फेल हो गया

 

क्यों यंहा राजनीति के सारे तोते राम-राम सत् बोल रहे है

कुछ मुल्ले नादान  सियासत  से  अल्लाह को खोल रहे है

अब राम नाम  से  चन्दा  खाने  वाले अवध में डोल रहे हैं

सम्प्रदाय,मजहब की औकातें  हिन्दू,मुस्लिम खोल रहे है

 

जरा इतिहास  उठाओ  प्रभू राम ने मन्दिर कहां बनाये थे

फिर पीर मुहम्मद  ने मस्जिद के फतवे कब-कब गाये थे

हम मन्दिर,मस्जिद के चक्कर में परं पिता  को भूल गये

अपने बाप छोड कर  दोनो  मजहब  की शूली में झूल गये

 

अच्छा होता तुलसीबाबा जन्म का विवरण भी लिख जाते

एक झलक में रामलला भी बाबर  को थोडा सा दिख जाते

जन्म-भूमि  का ऐसा  झगडा  नालायक में कभी ना होता

कवि  आग  भी  कविताओं से इन अपशिष्ठों को ना ढोता।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

9897399815

 

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