#Kavita by Rajendra Bahuguna

मैं खबरों को बेच रही हूँ

मैं मीडिया वैश्या  बनकर  सत्ता  की  सेवा करती हूँ

शब्दो के श्रृंगारों से  मैं  तन मन को  अर्पण करती हूँ

चौबीस घण्टे मैं सत्ता की  कामुकता को बुझा रही हूँ

अपने  ढंग से मैं  सत्ता के  सुलभ पैेंतरे सुझा रही हू

 

देव दासी सर्वस्व बेचकर  सत्ता का दिल बहलाती हूँ

सत्तादल के गीत सियासी  हर चैनल पर मैं गाती हूँ

राजनीति का  अब पथ-प्रर्दशन  मेरे  कोठे से होता है

वैेश्यालय के इस कोठे  में सत्ता दल का ही न्यौता है

 

इस कोठे में सभी प्रवक्ता  ग्राहक बन कर ही आते हैं

मैं जिससे जो बुलवाती  हूं,सभी सियासी वही गाते हेैं

मेरा टेण्डर अब सत्ता  के  गलियारों  में ही खुलता है

मेरे तन  में  लगा रोग भी  राजनीति  से ही धुलता है

 

राजनीति को खसम बनाकर  परदेशों  में भी जाती हू

पिया मिलन के सहवास की  खबरें चैनल पर गाती हूँ

आज सियासत मेरी तरूणायी  के कारण ही जिन्दा है

मेैं सत्ता को पाल रही हूँ बस, प्रतिपक्ष में ही निन्दा है

 

राजनीति  की  अय्यासी   को  मैं  ही तो पूरा करती हूँ

जितना  मेरा  ये  हुस्न चलेगा  उतना मैं पूरा चरती हूँ

पाँच साल की इस  सत्ता में  वैश्या  होना  पाप नही है

राजनीति में मान प्रतिष्ठा कंही कोई अभिशाप नही है

 

मैं इस राजनति के नौसीखिया प्रवक्त्ता संभाल रही हूँ

मैं भरी जवानी सत्ता-स्वामी पर उडेल कर डाल रही हूँँ

मैं चोैथे स्तम्भ  की  कोठी  सत्ता का दिल बहलाती हूँ

हम पूछेंगे, आर-पार  की  गजल सियासत की गाती हूँ

 

आज देश की रक्षा करना इस सत्ता की औकात नही है

फिर प्रजातन्त्र के इन हिजडों में मर्दो वाली बात नही है

अब इसिलिये तो  मेरा  कोठा  सत्ता की सेवा करता है

क्यों हर जोकर  आज मिडिया मे आकर पानी भरता हेै

 

उद्योग जगत के हाथ मीडिया मजबूरी में फंसा पडा है

इस कीचड में  खबर का खोजी,पत्रकार भी धंसा पडा है

अब इस कोठे से बाहर आना अपने बस की बात नही है

कवि आग अब चैनल  पर राष्ट्-भक्ति जज्बात नही है।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

मो09897399815

 

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